Bulley's Eye : छलेगी चुनाव की मरीचिका
Bulley's Eye : छलेगी चुनाव की मरीचिका
आजकल, रह-रहकर यह एक विचार मन को परेशान किया करता है कि क्यों आदमी उन्हीं झांसों और धोखों का बार-बार शिकार हो जाता है? धोखे से कुछ सीखता क्यों नहीं? पैसा या जेवर दुगना करने वाले, मिट्टी के मोल सोने की ईंट बेचने वाले, कलूटों को भी झक्क गोरा बनाने की क्रीम के विज्ञापन, वशीकरण की अंगूठी बेचने वाले, आदमी का कद सीधे दो फीट बढ़ा देने के दावे, ऊंचा ब्याज देने वाली चिटफंड कंपनियों से कई लोग रोज ही इनसे धोखे खाते हैं और रोज इनके ही पीछे आंखें मींचकर पैसा लेकर दौड़ते भी हैं। अखबारों में इनके किस्से पढ़ते हैं। खुद भी खा चुके होते हैं। पर, हर बार लगता है कि औरों के साथ हुआ पर कभी मेरे साथ नहीं होगा। या, इस बार तो धोखा होगा ही नहीं। यही होते सब तरफ देख रहा हूं आजकल। चुनाव हैं। वायदे हैं। धोखे हैं। विश्वास है। गरीबी हटा देने वाले, टैक्स समाप्त करने के वायदे, सबको नौकरी के मायावी झटके, गाल की तरह चिकनी सड़कें, ईमानदार प्रशासन देने की बातें, धर्म निरपेक्षता - हमको इन बातों और दावों की असलियत पता है, फिर भी। शुरू से स्पष्ट रहता है कि ये सब झांसे हैं। पर मन है कि कहता है, शायद इस बार बात सच निकले। वोट देने के लिए मन हर बार एक तर्क खोजता है। हम, मानो खुद को ही धोखा देते हैं। वोट के बाद रोते हैं कि सब झांसा निकला। अरे, जो शुरू से झांसा ही था वह और क्या निकलता?रह-रहकर सोचता हूं कि एकदम साफ दिख रहा झांसा हम कैसे खा जाते हैं? हम ऐसे मूर्ख भी नहीं। बल्कि, कई अर्थो में तो ज्यादा ही समझदार हैं। फिर? तो क्या हम ज्यादा ही आशावादी हैं? पर हर आशावाद में भी यथार्थ की एक समझ तो निहित होती ही है। इसके बिना आशावाद कविता का विषय हो सकता है, जीवन जीने का तरीका नहीं। ऐसा आशावाद शेखचिल्ली का निठल्ला दिवास्वप्न जरूर हो सकता है। तो आशावाद से भी कोई स्पष्टीकरण नहीं बनता। तो क्या झांसा न खाने का विकल्प ही नहीं बचा हमारे पास? हमें झांसा खाना ही पड़ेगा? या कहीं हमें धोखा खाने में मजा ही न आने लगा हो कि हम विकल्प की तलाश ही नहीं करते? मैंने एक नेता से यही प्रश्न पूछा था। मैंने कहा कि आप बार-बार उन्हीं-उन्हीं वायदों को दोहराने-तिहराने की हिम्मत कैसे कर लेते हो? कैसे आप, लगभग असंभव दावे और वायदे लेकर जनता से वोट मंगाने पहुंच जाते हो? डर नहीं लगता कि कभी कोई जुतिया देगा? या तुम्हारे मुंह पर थूक ही दे तो? या मुंह पर ही हंसने लगे? विश्वास ही न करे? .. वह हंसा। बोला कि ऐसा कभी नहीं होगा। राजनीति लोकतंत्र को जितना बंजर करेगी, जितना इसे रेगिस्तान में बदलेगी, उतना ही हमारा काम आसान होता जाएगा। रेगिस्तान में भटकता आदमी मरीचिका के पीछे भागता है कि नहीं। खूब जानता है कि पानी नहीं होगा, भ्रम मात्र है, तब भी भागता तो है। क्यों? क्योंकि उसे लगता है कि इस बार शायद यह भ्रम न हो। लुभावने वायदे ऐसे लोकतंत्र में हमेशा आकर्षित करते हैं, जिसमें वायदे पूरे करने की किसी की जिम्मेदारी तय न हो। नेताजी शायद सही कह रहे हैं। तब? तो पहले लोकतंत्र को सींचें। इसे रेगिस्तान न बनने दें। लोकतंत्र को रेगिस्तान बनने दोगे तो मरीचिका तो छलेगी ही!